सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया बुलंदशहर हत्याकांड में फांसी की सजा पाए तीन आरोपियों को

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ABC NEWS: बुलंदशहर में निचली अदालत और इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने के बाद मौत के साये में जी रहे तीन कैदियों को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से बड़ी राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बुलंदशहर (Bulandshahr) में 2014 में छह लोगों की हत्या के मामले में मौत की सजा काट रहे तीन कैदियों को बरी कर दिया. दरअसल, मामला संपत्ति विवाद का है, जिसमें निचली अदालत और इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा तीनों कैदियों को माता-पिता, भाई और तीन अन्य रिश्तेदारों की हत्या में फांसी की सजा सुनाई गई थी. मगर अब सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों कैदियों को मौत की सजा से बरी कर दिया है.

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एल नागेश्वर राव, बीआर गवई और बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ उचित संदेह से परे मामले को साबित करने में विफल रहा. पीठ ने टिप्पणी की कि जिस तरह से ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस केस में आरोपियों को दोषी साबित करने के लिए मामले को निपटाया, वह दुखी और हैरान करने वाला है.

हाईकोर्ट के कुछ निष्कर्षों पर हैरानी जताई 
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के कुछ निष्कर्षों पर हैरानी जताई और कहा कि हाईकोर्ट के कुछ निष्कर्ष आपराधिक न्यायशास्त्र के लिए ‘विदेशी’ हैं और हाईकोर्ट का आदेश भी अनुमानों के दायरे में आता है. पीठ ने आरोपी मोमिन खान, जयकम खान और साजिद द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने वर्तमान मामले से जिस तरह से निपटाया है, उससे हम हैरान हैं. इसलिए हम पाते हैं कि अभियोजन पक्ष मामले को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा. आरोपी को दोषसिद्धि और मौत की सजा कानून में पूरी तरह से टिकाऊ नहीं है.

दोषी ठहराने में गलती की थी
सभी सबूतों का विश्लेषण करने के बाद शीर्ष अदालत ने कहा कि निचली अदालत और उच्च न्यायालय ने उन्हें दोषी ठहराने में गलती की थी, जबकि सबूत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि जब अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश चार आरोपियों के जीवन और मृत्यु के सवाल पर विचार कर रहे थे, तो वह वर्तमान मामले को इतने अनौपचारिक तरीके से कैसे निपटा सकते थे.

आरोपी को सजा देने से पहले गहनता से विचार करें
बेंच ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के निष्कर्ष न केवल साक्ष्य अधिनियम के सुस्थापित कानून के विपरीत थे, बल्कि आरोपी पर बोझ डालने का प्रयास किया गया था, जो तब तक नहीं बदलता जब तक कि अभियोजन पक्ष मामले को उचित संदेह से परे साबित नहीं कर देता. पीठ ने अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट से अपेक्षा की जाती है कि वे आरोपी को सजा देने से पहले गहनता से विचार करें.

ये है मामला
बता दें कि मोमिन खान पर जयकम और साजिद की मदद से एक संपत्ति विवाद के बाद अपने माता-पिता, भाई और अन्य रिश्तेदारों की हत्या करने का आरोप लगाया गया था. मोमिन की पत्नी को भी निचली अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी. मगर उच्च न्यायालय ने उसकी सजा को खारिज कर दिया था. अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 23 जनवरी 2014 को चारों आरोपियों ने मिलकर बुलंदशहर में मोमिन के पिता, मां, भाई शौकिन खान, भाभी शन्नो, भतीजे और उसके भाई की भतीजी की हत्या कर दी थी.

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