इटावा में एक गांव ऐसा जहां बिच्छुओं से खेलते हैं होली, बड़े बूढ़े-बच्चे एक दूसरे पर फेंकते हैं बिच्छू

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ABC NEWS: होली मनाने का देश के कई शहरों में अपना अलग-अलग तरीका है. वृंदावन में फूलों के साथ तो बरसाने में लट्ठ मार होली मनाई जाती है. बाबा की नगरी काशी में मणिकर्णिका घाट पर मुर्दों की राख से होली खेली जाती है. लेकिन, क्या आप जानते हैं इटावा में एक ऐसा गांव हैं जहां रंगों की जगह बिच्छुओं से होली खेली जाती है. बिच्छू का नाम सुनते ही आप चौंक गए होंगे और चौंकना भी लाज़मी है लेकिन यह बिल्कुल सच है… यहां फाग की थाप पर सैकड़ों की संख्या में बिच्छू अपने बिलों से बाहर आ जाते हैं और फिर गांव में बड़े हों या बच्चे सभी बच्छुओं से होली खेलते हैं. बिच्छुआें को हाथों में उठाकर एक दूसरे पर फेंकते भी हैं.

आम तौर पर बिच्छू का नाम जेहन में आते ही लोगों की रूह कांप जाती है लेकिन इटावा के ताखा क्षेत्र के सौंथना गांव में होली के दिन सैकड़ों बिच्छूओं को एक साथ देखा जा सकता है, जो ग्रामीणों के साथ दोस्ताना व्यवहार निभाते नजर आते हैं. इस विज्ञानी युग में इस गांव में यह नजारा किसी रहस्य जैसा ही लगता है. होली के दिन जैसे ही फाग की थाप ढोलक पर पड़ती है वैसे ही सैकड़ों की संख्या में बिच्छू अपने बिलों से बाहर निकल आते हैं, जिन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानो वे होली की शुभकामनाएं देने बाहर आए हैं. बच्चे इन बिच्छुओं को पकड़कर खूब खेलते हैं और एक दूसरे पर फेंकते भी हैं लेकिन मजाल है जो ये जहरीले बिच्छू किसी को डंक मार दें. सुनने में यह कुछ अजीब जरूर लग रहा होगा लेकिन सौंथना गांव की यह प्रथा सैकड़ों वर्षों से ऐसे ही चली आ रही है.

सौंथना गांव के बाहर भैंसान नाम का प्राचीन टीला है। इस टीले पर हजारों की संख्या में ईंट और पत्थरों के टुकड़े पड़े हुए हैं, जिन्हें आमतौर पर लोग हटाते हैं तो नीचे कुछ नहीं दिखता है. लेकिन, जब होली पूर्णिमा के दूसरे दिन परेवा की शाम को बड़े, बुजुर्ग और बच्चे टीले पर एकत्र होते हैं और फाग गायन की शुुरुआत करते हैं तो ईंट-पत्थरों के बीच ना जाने कहां से हजारों की संख्या में जहरीले बिच्छूओं का निकलना शुरू हो जाता है.

बड़े और बच्चे सभी इन बिच्छुओं को उठाकर अपनी हथेली पर रख लेते हैं और वे उनके शरीर पर रेंगते रहते हैं। ऐसा लगता है मानों बिच्छू गले मिलकर होली की बधाई दे रहे हों. बच्चे एक दूसरे पर बिच्छुओं को फेंककर खेलते हैं लेकिन वे उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं. टीले से जाने से पहले गांव के बच्चे बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं और फिर बिच्छुओं को वहीं पर छोड़ देते हैं. अगले दिन टीले पर एक भी बिच्छू भी नहीं दिखाई देता है.

सौंथना गांव के रहने वाले कृष्ण प्रताप सिंह भदौरिया कहते हैं कि होली पर फाग गायन के समय कई दशकों से बिच्छू निकल रहे हैं. खास बात यह है कि होली के दिन ये जहरीले बिच्छू किसी को डंक नहीं मारते हैं. होली के बाद घरों में जब यही बिच्छू निकलते हैं तो डंक भी मारते हैं और जहर भी चढ़ जाता है। ग्राम प्रधान उमाकांत शुक्ला कहते हैं कि भैसान टीले पर होली की परेवा को फाग गायन के समय बिच्छूओं के निकलने की परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है. लोग बताते हैं कि इस टीले पर हजारों की संख्या में पड़े ईंट-पत्थर का कोई टुकड़ा यदि ले जाकर रख लें तो घर में बिच्छू निकलना शुरू हो जाते हैं.

कहा जाता है किसी समय इस टीले पर भैंसों की बलि दी जाती थी. किवदंती यह भी है कि पहले यहां पर कोई मंदिर भी था लेकिन मुगलों के समय युद्ध में उसे ध्वस्त कर दिया गया. इसकी पुष्टि यहां पड़़े मूर्तियों के टूटे अवशेष से होती है. उमाकांत बताते हैं आज भी गांव के लोग इस टीले को भैसान बाबा के रूप में पूजते हैं. गांव में जब किसी की शादी होती है तो तेल चढ़ाने की पंरपरा इसी टीले पर निभाई जाती है. लोग यहां आकर मन्नत भी मानते हैं और पूरी होने पर पूजा करते हैं.

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